महाराष्ट्र : कैसे टूटा सत्ता का चक्रव्यूह, शरद पवार कैसे बने राजनीति के चाणक्य?

महाराष्ट्र में जैसे-जैसे सरकार बनाने के दिन बीतते जा रहे थे और बीजेपी-शिव सेना में तनातनी और बढ़ती जा रही थी भारतीय राजनीति के मौजूदा चाणक्य शरद पवार सत्ता के इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए रणनीति बनाते जा रहे थे. शरद पवार इस पूरे संकट में लगातार सोनिया गांधी के संपर्क में थे. पवार ने इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए सोमवार, यानी 11 नवंबर का दिन चुना. सोनिया गांधी भी अपनी रणनीति बनाने में जुटी थीं. वे सोमवार को सुबह से ही अपने पार्टी नेताओं के साथ सलाह-मशविरा में जुटी थीं

उधर मुंबई में उद्धव ठाकरे ने शरद पवार ने एक पांच सितारा होटल में मुलाकात की. शाम साढ़े सात बजे एनसीपी नेता अजीत पवार का बयान आया कि हम कांग्रेस के समर्थन की चिट्ठी का इंतजार कर रहे हैं और जब तक कांग्रेस की चिट्ठी नहीं आती हम इंतजार करेंगे. यदि समर्थन की चिट्ठी राज्यपाल को देनी होगी तो हम साथ में देंगे. लोगों को लगा कि कांग्रेस चिट्ठी देने में देरी कर रही है मगर यह शरद पवार और सोनिया गांधी की बातचीत में तय हो गया था कि हम जल्दबाजी में समर्थन की चिट्ठी नहीं देने वाले हैं. यह शरद पवार की एक और चाणक्य नीति थी.

शुरुआत में सोनिया शिवसेना को किसी भी हालत में समर्थन नहीं देने पर अड़ी थीं. वजह थी कांग्रेस की केरल लॉबी क्योंकि वहां से कांग्रेस के 15 सांसद आते हैं. एके एंटोनी और वेणुगोपाल कांग्रेस के शिव सेना को सर्मथन के पक्ष में नहीं थे. उनका कहना था कि कांग्रेस कैसे किसी हिंदुवादी पार्टी को समर्थन दे सकती है. माना जा रहा कि राहुल गांधी भी शिव सेना को अंदर या बाहर से सर्मथन देने  के पक्ष में नहीं थे. मगर उसी वक्त यानी सोमवार की दोपहर में महाराष्ट्र के कांग्रेस नेता मसलन सुशील कुमार शिंदे, पृथ्वीराज चौहान और अशोक चव्हाण सोनिया गांधी से मिलने पहुंचे. तीनों सोनिया गांधी को इस बात के लिए समझा रहे थे कि यदि कांग्रेस ने शिव सेना को समर्थन नहीं दिया तो पार्टी टूट सकती है. इसी बीच पांच बजे शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सोनिया गांधी से फोन पर बात की और अधिकारिक रूप से कांग्रेस का समर्थन मांगा. सोनिया गांधी ने उद्धव ठाकरे से कहा कि उनको बाद में बताएंगे. इसके एक घंटे बाद यानी छह बजे शरद पवार ने सोनिया गांधी से फोन पर बात की और उनसे कहा कि कोई भी निर्णय जल्दबाजी में न किया जाए. पहले हमें बातचीत करनी चाहिए.

उधर शिव सेना बिना समर्थन की चिट्ठी के राज्यपाल के पास पहुंची और उसे 24 घंटे के अंदर बहुमत साबित करने के लिए कहा गया. अब फिर शरद पवार ने सोनिया गांधी से संपर्क किया और उन्हें मनाने में जुट गए कि हमें शिवसेना को समर्थन देना चाहिए और सरकार में शामिल होना चाहिए. सोनिया गांधी पहले हां करने से कतरा रही थीं मगर जब यह सवाल आया कि कांग्रेस के लिए बीजेपी बड़ी दुश्मन है या शिव सेना? तो सोनिया गांधी सोचने पर मजबूर हो गईं. दिल्ली में मौजूद महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेता लगातार सोनिया पर दबाब बना रहे थे कि वे शिव सेना को समर्थन देने के लिए मान जाएं. इन्हीं कांग्रेसी नेताओं ने जयपुर में मौजूद कांग्रेस विधायकों की राय भी सोनिया गांधी को बताई और कुछ विधायकों से बात भी कराई

इधर दिल्ली में दोपहर में ही प्रधानमंत्री ने ब्राजील जाने के पहले कैबिनेट की बैठक बुलाकर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन पर मुहर लगा दी. बस राष्ट्रपति का इंतजार था जो उस वक्त पंजाब में थे. शाम होते-होते उनकी मुहर भी लग गई. इसके तुरंत बाद मुंबई में अहमद पटेल और शरद पवार ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की और महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन की आलोचना की. उन्होंने कहा कि राज्यपाल को कांग्रेस को भी मौका देना चाहिए था. उन्होंने सरकार बनाने पर कहा कि कांग्रेस और एनसीपी के नेता आपस में बैठकर तय करेंगे कि आगे क्या करना है और बाद में शिव सेना को इससे अवगत करा दिया जाएगा. यानी पवार ने सारा ‘पावर’ अपने हाथ में ही रख लिया और शिवसेना अब ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां उनकी नैया एनसीपी और कांग्रेस की पतवारों के बिना किनारे तक नहीं पहुंच सकती है.

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