महिलाओं द्वारा तोड़ी गई रुढ़ीवादी परंपरा:बहू और बेटियों ने अर्थी को दिया कंधा

महिलाओं ने रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ते हुए कुछ ऐसा कर दिखाया कि पूरे समाज लिए मिसाल बन गईं.प्रखंड क्षेत्र के सुंदरा गांव में सोमवार को सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ महिलाओं ने अर्थी को कंधा दिया. आमतौर पर महिलाएं अर्थी को कंधा नहीं देतीं, लेकिन अर्जक संघ की पहल पर महिलाओं ने अर्थी को कंधा देकर लोगों को रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ने का संदेश दिया.

मामला केवल अर्थी को कंधा देने तक ही सीमित नहीं रहा. बल्कि उन्होंने अर्थी को कंधा देकर शमशान तक पहुंचाया और मुखाग्नि के पहले होने वाले विधान में पुरुषों के बराबर भाग लिया.

दरअसल हिंदू समाज में पुरातन काल से ही महिलाओं का श्मशान क्षेत्र में जाना वर्जित माना जाता है, लेकिन बदलते दौरा में यहां इस परंपरा को भी तोड़ कर समाज की महिलाओं को प्रेरित किया.

नवादा के प्रसिद्ध होम्योपैथिक चिकित्सक डॉक्टर सुधीर कुमार के पिता सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक दशरथ प्रसाद का निधन हो गया था. उन्हीं के अंतिम संस्कार के लिए परिजनों के साथ ही समाज की महिलाओं ने उनकी अर्थी को कंधा दिया.

सुंदरा गांव में अंतिम संस्कार में मृतक की पुत्री इंदु कुमारी, शिक्षिकाएं बहुएं प्रतिभा सिन्हा, संगीता सिन्हा, डॉक्टर अंशुमाला, समधन सुमित्रा, जानवी, एलिजा, सौम्या, सुरभि, जिज्ञासा, जूही, तान्या, तनु समेत परिवार-समाज की अन्य महिलाओं ने भी अर्थी को कंधा दिया.

मृतक के पुत्र अशोक कुमार व गौतम कुमार महिलाओं के पीछे शव को कंधा देते दिखे. हालांकि गांव में महिलाओं द्वारा शव को कंधा देने पर दबी जुबान पर लोग तरह-तरह की चर्चा कर रहे थे, लेकिन महिलाओं ने इसकी परवाह किए बगैर अर्थी को कंधा देकर शमशान तक पहुंचाया.



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